आप में से अधिकतर जो गांव से सम्बंधित हैं उन्होंने लगभग वही जीवन जिया होगा जो मैंने जिया है मैं आर्य समाज के लिए कार्य क्यों करता हूँ….सुबह उठते ही विद्यालय के लिए तैयार होने की हड़बड़ी….सुबह सबसे पहले बाड़े(पशुशाला) में जाकर दूध आदि निकलवाना…फिर जल्दी जल्दी से विद्यालय के लिए तैयार होना….और कितना भी प्रयास करने के बाद विद्यालय देर से पहुंचना और अलग पंक्ति में खड़ा होकर डन्डे खाना…फिर छुट्टी के बाद घर पर आकर दोपहर को कुछ देर सोना,फिर पढ़ना और फिर शाम को पशुशाला में जाकर घर वालों के साथ कार्य करवाना….अगली सुबह फिर यही सब….
इस सब के बीच रोमांचकारी दिन होता था इतवार की छुट्टी का….इस दिन सुबह सुबह बैलगाडी में बैठकर खेत में जाना….वहां काम कम करना और खेलना कूदना ज्यादा….क्या यह सब शांति और आनन्द देता था…?
नही…!इससे भी ज्यादा एक आनन्ददायक पल होता था…जो गांव में रहने वाले खेती से जुड़े परिवार के लगभग हर बच्चे ने जिया है…
खेत में खेलने कूदने के बाद जब दोपहर को वहीँ पर पेड़ के नीचे बैठकर खाना खाते थे तो उससे सुखद क्षण शायद ही हमारे जीवन में कोई होता हो….न कल की चिंता,न आज की,बचपन बस उसी पल के लिए समर्पित होता है जिस पल में बच्चा जी रहा होता है….थकावट के बाद खेत में यदि सुखी रोटी और नकम भी मिल जाये तो वो भी फाइव स्टार होटल के बड़े से बड़े व्यंजन से ज्यादा आनंद देता है…यह बात हर मेरे जैसा ग्रामीण जानता है..
औरों की मैं नही कह सकता पर मेरे जीवन का सबसे सुखद क्षण वही होता था….एक शांति सी मिलती थी….
मुझसे अक्सर कई व्यक्ति कहते रहते हैं कि भाई तू हर समय आर्य सिद्धांतो की ,आर्य समाज की रट क्यों लगाये रखता है…क्या मिलेगा तुझे लोगों को सही रास्ते पर लाकर… यदि उन्हें सुधरना होगा तो वो स्वयं ही सुधर जायेंगे….उन्हें जीने दो वो जैसे भी पाखण्ड में जी रहे हैं ,तू क्यों उनकी चिंता करता है…..
तो मैं अपने उन भाइयों को बताना चाहता हूँ….भाइयो हर समय आर्य सिद्धांतो की बात करने के पीछे मेरा स्वार्थ है…मुझे आर्य सिद्धांतो की बात करने में वही आनन्द वही शांति मिलती है जो खेत में दोपहर में पेड़ के निचे बैठ कर खाना खाने में एक बच्चे को मिलती है….मुझे वही बचपन का आनन्द मिलता है ईश्वर के आदेश “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” को पूरा करने के संघर्ष में….मुझे वही आनन्द वही शांति वही तृप्ति मिलती है जब सत्र के दो दिन पूरा करने के पश्चात मेरे सभी सत्रार्थी भाई “जय आर्य” “जय आर्यवर्त” का उद्घोष लगाते हैं,जब वो हमारी भावना को हमारे उदेश्य को समझ जाते हैं….
और जब तक ईश्वर कृपा से सामर्थ्य है तब तक यही आनन्द लेता रहूँगा…वो शहरी कुल डूड इस आनन्द को नही समझ सकते जिनके लिए सप्ताह में छुट्टी वाला दिन इतवार न होकर सन्डे होता था….जिन्होंने कभी खेत में पाँव भी नही रखकर देखा….और विशेषतः जिन्होंने खेत में जी तोड़ मेहनत के बाद किसी पेड़ के निचे बैठ कर खाना नही खाया….यदि मेरे आनंद का आंकलन करना चाहते हो तो किसी दिन भरी दुपहरी में खेत में काम करने के बाद किसी पुराने पेड़ के निचे बैठकर खाना खाकर देख लेना…..स्वयं पता चल जायेगा कि आर्य क्यों हर समय कृण्वन्तो विश्वमार्यम् का स्वप्न आँखों में पाले रहते हैं….
धन्यवाद….!
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